ग़म की नदी में उम्र का पानी ठहरा ठहरा लगता है -ये फिकरा झूठा है लेकिन कितना सच्चालगता है
चार पलों या चार दिनों में होगा वो महदूद मगर जीस्तके आँगन में उम्र का दामनफैला फैला लगताहै
शीन काफ निजाम की ये पंक्तियाँ कितनी अच्छी लगती है जिंदगी का ये नजरिया वाकई बड़ा सच्चा है ...
ब्लॉग शुरू करने के बाद पता नही क्या-क्या घटनाएँ घटी के ब्लॉग आगे बढ़ ही न पाया ....मुंबई की उबड़ खाबड़ सड़केंकितनी खतरनाक है ये अनुभव मैंने अच्छे से प्राप्त करलिया --एक रिकॉर्डिंग से लौटते वक्त सान्ताक्रुज़ के ब्रिज से अपनी मोटर साइकिलसे ख़राब रोड की वजह सेस्किड होकर घायल होना पड़ा खैर अपने चाहने वालों की दुआओं और इश्वर की कृपा से फिर से आपका दोस्त ब्लॉग और विविध भारती के ज़रिये कॉम कल आपके सुझाव मिले तो ब्लॉग को अपडेट करने में काफ़ी मदद मिलेगी मुझे आप ईमेल इस पते पर कर सकते हैं -hkb1168@gmail.com
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